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विंध्य प्रदेश का उदय ओर गाथा

विंध्य प्रदेश भारत का एक पूर्व राज्य था जो कि बहुत ही कम समय के लिए अस्तित्व में रहा यानी लगभग 8 साल के लगभग,भारत के स्वतंत्रता काल के तुरंत बाद निर्मित राज्यों में से एक था विंध्य प्रदेश यह मध्य भारत की रियासतों को मिलाकर बनाया गया एक छोटा लेकिन सांस्कृतिक रूप से अत्यंत समृद्ध प्रदेश था।
जिसका गठन 1948 में बघेलखंड और बुंदेलखंड की कई रियासतों को मिलाकर किया गया ।विंध्य प्रदेश की पहचान मुख्यतः विंध्याचल पर्वतमाला, बघेल ,राजपूत एवं ब्राह्मण परंपराओं, प्राचीन जनजातीय संस्कृति और मध्यभारतीय राजनीतिक आंदोलनों से जुड़ी रही। इसका इतिहास उदय काल से शुरू होकर मध्यप्रदेश के विलय से वर्तमान राजनीति में भी विंध्य प्रदेश पृथक राज्य की मांग आज भी जारी है आइए चलते है अस्तित्व की ओर

विंध्य प्रदेश का उदय……

12 मार्च 1948 को भारत सरकार ने बघेलखंड और बुंदेल खंड की लगभग 35 रियासतों को मिलाकर विंध्य प्रदेश राज्य की स्थापना की, और 4 अप्रैल 1948 को ओपचारिक रूप से विंध्य प्रदेश का उद्घाटन हुआ ।यह स्वतंत्र भारत के शुरुआती राज्यों में से एक था। इनमें मुख्यत: रीवा गोविंदगढ़ बांधवगढ़ अजयगढ़, शहडोल अनूपपुर उमरिया सहित बरैंधा, बिजावर ,छतरपुर , पन्ना ,चरखारी, मैहर, नागोद, समथर,अलीपुरा, रामपुर नैकिन, बेरी ,सीधी, बिझाट बिजना ,धुरवाई ,गरौली ,गौरिहार, सिंगरौली, जिमी, खनियाधाना ,कामता ,राजोला (चौबे जागीर),कोठी ,किसर (कुज्जे जागीर)
,लुगासी नैगां ,रेवाई,पहरा (चौबे जागीर) ( बेवरि ) सरीला ,सिहावल, सतना , जागीर सोनभद्र, मिर्जापुर, इलाहाबाद से सटे कुछ जागीर,को सम्मिलित किया गया।

विंध्य प्रदेश में कुल लगभग 13 रियासतें और
रीवा सतना सीधी शहडोल पन्ना
छतरपुर टीकमगढ़ दतिया प्रमुख जिले के रूप में शामिल थे।
विंध्य प्रदेश का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण केंद्र था रीवा राज्य, जिसका ऐतिहासिक और सांस्कृतिक प्रभाव पूरे इलाक़े पर था
प्रारम्भिक राजधानी: रीवा

बाद में प्रशासनिक सुविधा के लिए विंध्य निवास (रीवा के निकट) को भी प्रशासनिक कैंप के रूप में विकसित किया गया।
क्षेत्र विंध्याचल पर्वतों से घिरा हुआ, घने जंगल, खनिज संसाधन, और नदियाँ—जैसे सोन, बाणगंगा, सोन, नर्मदा के कुछ ऊपरी क्षेत्र—इसकी विशेषता थीं।
यह क्षेत्र प्राचीन शैव, शक्त और ब्राह्मण संस्कृति का भी प्रमुख केंद्र रहा।

यहां के प्रथम राजप्रमुख महाराज मार्तंड सिंह जुडेव (रीवा)
उन्हें संयुक्त रियासतों का राजप्रमुख बनाया गया। प्रारम्भ में रियासतों की वजह से प्रशासनिक चुनौतियाँ अधिक थीं।रीवा और उसके आसपास राजनीतिक चेतना प्रारम्भ से ही मजबूत रही:

जनसंघ और कांग्रेस दोनों की मजबूत उपस्थिति

राजपूत–ब्राह्मण राजनीति का केंद्र
रीवा का ऐतिहासिक योगदान

बाघेल वंश की सांस्कृतिक भूमिका के साथ साथ भारत का पहला सफारी टाइगर रिज़र्व – बंधवगढ़ में बनाया गया।
राजा राम चंद्र के दरबार में राग दरबारी के गायक–कवि और कला परंपरा देश में एक अलग पहचान बनी।
विंध्य के विलय की एक अलग ही दास्तान ……
स्वतंत्रता के बाद भारत में कई रियासतों को मिलाकर छोटे-छोटे राज्य बनाए गए थे। उन्हीं में से विंध्य प्रदेश भी एक था।
इस राज्य की मुख्य समस्याएँ थीं—
आय का स्रोत बहुत कम
ग्रामीण क्षेत्र अत्यधिक विस्तृत लेकिन पिछड़ा सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाएँ सीमित
प्रशासनिक खर्च राज्य की आय से कई गुना अधिक
रियासती व्यवस्था से आधुनिक प्रशासन में संक्रमण कठिन
सरकार को लगा कि इतने छोटे राज्य अकेले विकसित नहीं हो पाएँगे।
जो रियासती शासक और पुराने जागीरदार थे, उनके हित नए लोकतांत्रिक ढांचे से टकराते थे। जिसके कारण सरकार विलय का विकल्प ढूंढने लगी।

भारत में भाषाई, सांस्कृतिक और प्रशासनिक आधार पर राज्यों का पुनर्गठन तय करने के लिए 1953 में SRC बनाया गया।

SRC ने विंध्य प्रदेश के बारे में कहा:
यह आर्थिक रूप से बहुत छोटा और कमज़ोर है अकेले खड़ा नहीं रह सकता इसे बड़े भू-भाग से मिलाया जाना चाहिए सांस्कृतिक और भौगोलिक दृष्टि से यह मध्य भारत और महाकौशल क्षेत्र से जुड़ा हुआ है
अंतिम फैसला — 1 नवंबर 1956
सरकार ने SRC की रिपोर्ट को स्वीकार किया।
1956 में States Reorganisation Act लागू हुआ और विंध्य प्रदेश, मध्य भारत और भोपाल राज्य को मिलाकर नया “मध्य प्रदेश” राज्य बनाया गया।
इस प्रकार विंध्य प्रदेश का अस्तित्व 8 साल बाद समाप्त हो गया।

विंध्य क्षेत्र की मुख्य सांस्कृतिक पहचान बघेली संस्कृति है जो अवधि भाषा से मिलती जुलती है

बघेली संस्कृति की मुख्य विशेषताएँ
बघेली भाषा और बोलियाँ
लोकगीत, वीरगाथाएँ और अल्हा-ऊदल परंपरा
कृषि आधारित लोकजीवन
नदी–वन–पर्वतों पर आधारित जीवनशैली
शादी-विवाह की पारंपरिक रीतियाँ
रीवा दरबार की शिष्टता और सभ्यता
रीवा नरेशों द्वारा संगीत, कला और शिक्षा को संरक्षण
,दरबार में संगीत की अनोखी परंपरा
महाराजा रघुराज सिंह, महाराजा गुलाब सिंह और मार्तण्ड सिंह जैसे शासकों की सांस्कृतिक दृष्टि
सफेद शेरों के संरक्षण की शुरुआत
रीवा दरबार की शिष्टता, अनुशासन और सांस्कृतिक संपन्नता आज भी विंध्य क्षेत्र की पहचान है।

*विंध्य की लोकगीत * जैसे अल्हा — वीरगाथा पर आधारित फाग — होली में कजरी और झूला — सावन में
बधाई गीत — शुभ अवसरों पर सोहर ब्याह आदि सम्मिलित है।
निर्गुन और भजन — आध्यात्मिक गीत काफी लोकप्रिय रही है।

विंध्य क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक स्थल

माँ शारदा मंदिर (मैहर) चित्रकूट धाम विंध्यवासिनी मां का मंदिर
बृहसिंहपुर शंकर जी का मंदिर(रीवा)
चचाई जलप्रपात , देवतालाब,मंदिर
महा मृत्युजंय मंदिर किला
अमरकंटक — नर्मदा उद्गम (अनूपपुर
विंध्य की भोजन परंपरा बेहद प्राकृतिक, पौष्टिक और ग्रामीण संस्कृति का प्रतीक रही है जैसे कढ़ी इंदरहर,रसाज करी पपड़ी कोदव घुघरी खीर हलवा इत्यादि व्यंजन वहां की पहचान है ।
विंध्य प्रदेश की संस्कृति केवल रीति-रिवाजों का संग्रह नहीं, बल्कि एक जीवंत परंपरा है जो—
भाषा, संगीत, लोककला, धर्म, वन-जीवन, शौर्य और शिष्टता का अद्भुत समन्वय है।

जेपी मिश्रा की कलम 🖋️,….

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