अल्हा–उदल गीत (बहादुरी के गीत)
निर्गुण भजन
देवी-स्तुति गीत
कजरी, चौताल, बिरहा (पूर्वांचल + विंध्य क्षेत्र में प्रसिद्ध)
ढोलक
नगरी
एकतारा
बांसुरी
मंजीरा
यही क्षेत्र भारत के महान संगीतकार तानसेन का जन्मस्थान है — संगीत पर उनकी छाप आज भी दिखती है।
बाटी–चोखा / दाल-बाटी — ग्रामीण इलाकों में सबसे लोकप्रिय।
पोहे-जिलेबी — सुबह का हल्का नाश्ता (मध्य प्रदेश की पहचान)।
कढ़ी-चावल — आम घरों में अक्सर बनने वाला खाना।
भुट्टा / मक्का आधारित व्यंजन — क्षेत्र में मक्का की खेती अधिक।
लोठ, साग, कचरी की चटनी — जनजातीय और ग्रामीण खाने का हिस्सा।
लड्डू, पुए, खीर — त्योहारों पर बनाए जाते हैं।
मसाला चाय
महुआ का पेय (tribal culture)
शरबत और ठंडाई (गर्मियों में)
बुंदेली
अवधी
भोजपुरी (कुछ हिस्सों में)
हिंदी (Standard Hindi)
जनजातीय बोलियाँ — गोंडी, बैगा आदि।
हर भाषा में लोकगीत और लोककथाएँ मिलती हैं जो क्षेत्र की विशेष पहचान हैं।
परिचय: भारत का स्वर सम्राट – तानसेन
भारत के संगीत इतिहास में यदि किसी एक नाम ने अपनी कला, समर्पण और अद्भुत प्रतिभा से युगों-युगों तक अमरता प्राप्त की है, तो वह हैं मियाँ तानसेन।
तानसेन न केवल हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के सबसे प्रभावशाली व्यक्तित्व माने जाते हैं, बल्कि वे उन कुछ महान कलाकारों में थे जिन्होंने राजसी दरबार से लेकर जनमानस तक संगीत को जीवित किया।
उनकी कहानी विंध्यांचल के शांत, प्राकृतिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध क्षेत्र से शुरू होती है, जहाँ से उनकी संगीत यात्रा का बीज बोया गया था।
तानसेन का जन्म और विंध्यांचल का सांस्कृतिक प्रभाव
तानसेन का जन्म लगभग 1500 ई. के आसपास वर्तमान मध्य प्रदेश के विंध्यांचल क्षेत्र (कुछ ऐतिहासिक स्रोत ग्वालियर क्षेत्र भी बताते हैं) में हुआ।
✔ विंध्यांचल क्षेत्र अपने —
प्राकृतिक सौंदर्य
जनजातीय संस्कृतियों
लोकगीतों
भक्ति-संगीत
और आध्यात्मिक परंपराओं
के लिए प्रसिद्ध रहा है।
इसी वातावरण ने तानसेन को बचपन में ही प्रकृति के स्वर, ध्वनियों और लयों से जोड़ दिया।
कहते हैं, तानसेन बचपन से ही पक्षियों, जानवरों और नदी-पहाड़ों की आवाज़ों की नकल कर लेते थे।
लोग उन्हें “मोहम्मद ग़रीबदास” के नाम से जानते थे, लेकिन उनकी आवाज़ में छुपी क्षमता किसी को समझ नहीं आती थी।
एक बार वे जंगल में आवाज़ों की नकल करते हुए बैठे थे, तभी वहां से गुजर रहे थे—
संगीत के महान संत – स्वामी हरिदास
उन्होंने तानसेन में संगीत की दिव्य प्रतिभा देखी और उन्हें अपना शिष्य बना लिया।
संगीत शिक्षा: स्वामी हरिदास का मार्गदर्शन
स्वामी हरिदास, जो स्वयं एक सिद्ध संगीतकार थे, ने तानसेन को संगीत की गहराइयाँ सिखाईं।
उनसे तानसेन ने सीखा—
ध्रुपद शैली
स्वरसाधना
प्रकृति और संगीत का संबंध
रागों का आध्यात्मिक महत्व
इन्हीं वर्षों में तानसेन ने अपनी पहचान बनाई।
तानसेन का नाम धीरे-धीरे पूरे उत्तर भारत में प्रसिद्ध होने लगा।
उनकी आवाज़, उनका गायन और उनकी कला की चमक इतनी थी कि बात सम्राट अकबर तक पहुँची।
और जब उन्होंने तानसेन को सुना —
इसके बाद तानसेन को सम्राट अकबर ने अपने दरबार में विशेष सम्मान के साथ बुलाया।
तानसेन को अकबर ने “नवरत्न” का दर्जा दिया —
यानि उनके दरबार के नौ सबसे विद्वान और महत्वपूर्ण व्यक्तियों में एक।
उनकी विशेषताएँ:
✔ राग मल्हार से वर्षा बुलाना
✔ राग दीपक से वातावरण में अग्नि-ताप पैदा कर देना
✔ ध्रुपद गायन में महारथ
✔ वाद्ययंत्र रूपांतरण और प्रयोग
उनके बारे में दंतकथाएँ आज भी भारत की सांस्कृतिक धरोहर हैं।