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इस रणनीति के तहत पडी थी रीवा किले की नीव

इस रणनीति के तहत पड़ी थी रीवा किले की नींव

तेरहवीं सदी से आजादी के पूर्व तक मध्य भारत का रीवा राज्य बघेल राजवंश के अधीन रहा है ।वर्तमान रीवा और शहडोल संभाग के अतिरिक्त बुंदेलखंड तथा उत्तर प्रदेश का कुछ भाग भी रीवा राज्य का हिस्सा था।आजादी के पश्चात भारत गणराज्य में विलय के समय रीवा राज्य देश के बड़े क्षेत्रफल वाले राज्यों में से एक रहा है ।आजादी के पहले के वर्षों में रीवा इस राज्य की राजधानी रहा है,किंतु प्रारंभ में बघेल राजवंश की 22 वीं पीढ़ी तक यह राजधानी अन्य स्थलों में रही है । एक विशेष रणनीति के तहत दिल्ली में शेरशाह सूरी के सत्ता काल में इस किले की नींव पड़ी, जिसे बाद में बघेल राजवंश के विक्रमादित्य ने किले का स्वरूप देकर यहां से राज्य व्यवस्था का संचालन प्रारंभ किया ।
बघेल गुजरात के चालुक्य वंश के सोलंकी राजपूतों की एक शाखा है ।मध्य भारत में आकर राज्य की स्थापना करने वाले इस वंश के प्रथम पुरुष ब्याघ्र देव थे । दिल्ली में इल्तुतमिश के अस्थिरता वाले दौर में बघेलों ने यहां आकर गहोरा, जो अब बांदा जिले में है, को अपनी प्रारंभिक राजधानी बनाई । “बाबरनामा” में गहोरा के मजबूत राज्य होने का उल्लेख है । बाद में रामचंद्र जू देव ने बांधवगढ़ किले को सुरक्षा की दृष्टि से रीवा राज्य की राजधानी बनाया । प्रसिद्ध ध्रुपद गायक तानसेन और वॉकपटु बीरबल इन्हीं रामचंद्र के दरबारी नवरत्न थे जिन्हें बाद में अकबर ने दिल्ली दरबार में बुला लिया था। बांधवगढ़ के कारण ही बघेल राजाओं को बांधवेश भी कहा जाता है ।
तो अब बात रीवा नगर के राजधानी बनने के पीछे के रणनीतिक कारणों की…..
1527 में खानवा युद्ध के बाद दिल्ली की सत्ता में काबिज होने वाले बाबर और बघेल राजा वीर सिंह देव के अच्छे संबंध थे ।
बाबरनामा में बादशाह ने लिखा है कि उत्तरी भारत में वीर सिंह बहुत शक्तिशाली राजा है ।वीर सिंह के पुत्र वीरभानु थे जो हुमायूं के पक्षधर होने के नाते शेरशाह सूरी की आंख की किरकिरी भी थे । शेरशाह सूरी के सशक्त होने पर स्वाभाविक खतरे को भांपते हुए वे अपने मित्र कीर्ति सिंह चंदेल के पास कालिंजर किले में शरण लेने पहुंचे ।नाराज शेरशाह ने कालिंजर किले पर चढ़ाई कर दी हालांकि वीरभानु कालिंजर किले से सुरक्षित निकल गए । किले को तोड़ने की तैयारी से संबंधित रणनीति के तहत शेरशाह ने छोटे शहजादे जलाल खान को पूरब दिशा की निगरानी के लिए भेजा जिससे उधर से कोई राजपूती हमला न हो ।जलाल खान ने बिछिया तथा बीहर के संगम स्थल रीमा को निगरानी हेतु पड़ाव के लिए चुना ।फारसी में रीमा को रीवाँ कहा जाने लगा । इतिहास लेखक “रामभद्र गौड़” के अनुसार जलाल खान ने बेहतर तरीके से निगाह रखने के लिए रीवा किले की नींव रखी ।पुराने जमाने में बादशाही फौज के साथ रसद लेकर लमाना- बंजारा चलते थे । बंजारों को जलाल खान विशेष रूप से मानता था । उन्होंने लिखा कि किला परिसर में स्थित प्रसिद्ध महामृत्युंजय मंदिर का निर्माण इन्हीं बंजारों ने ही करवाया था ।
कालिंजर अभियान के दौरान शेरशाह सूरी की मृत्यु के पश्चात यही जलाल खान,इस्लाम शाह नाम से रीवा से जाकर गद्दी पर बैठा जिसे बाद में सलीम शाह के नाम से जाना गया ।
खैर…. रामचंद्र जूदेव जिनका युग बघेल राज्य के स्वर्ण युग के नाम से जाना जाता है,सुरक्षित किले बांधवगढ़ में ही रहे जहां 1590 में उनका देहांत हुआ ।पिता की मृत्यु की खबर सुनकर वीरभद्र देव फतेहपुर सीकरी से बांधवगढ़ के लिए प्रस्थान कर रहे थे तभी रास्ते में सोन नदी के पास पालकी से गिरकर मृत्यु को प्राप्त हो गए जिनकी छतुरी बरौंधा ग्राम में बताई जाती है ।अल्प वयस्क बालक विक्रमादित्य बांधवगढ़ दुर्ग में सरदारों की देखरेख में थे इनका कार्यकाल 1593 से 1624 माना जाता है ।बाद में 1605 में अकबर के देहांत के पश्चात उन्होंने रीवा नगर में जलाल खान द्वारा निर्मित ठिकाने को आवश्यकता अनुसार किले में परिवर्तित कर रीवाँ को नई राजधानी बनाया । ऐसा कहा जाता है कि 1605 से 1615 के बीच रीवा सामान्य से स्थान से एक सुसज्जित नगर में परिवर्तित हो गया ।
किले के बाहर उपरहटी में जहां इक्का-दुक्का लोगों की बसाहट थी,वहां पूरी बस्ती बस गई ।गहोरा से बांधवगढ़ और बांधवगढ़ से रीवा, राजा के साथ मुस्लिम संप्रदाय के लोगों का एक पूरा जत्था चलता था। ऊंट और हाथियों का जिम्मा इन्हीं के पास था ।यह लोग राजा के रात्रिकालीन पहरेदार थे ।इन्हें निकटवर्ती स्थान में ही पूरब की ओर बसाया गया महावतों को हाथियों के नहलाने की सुविधा को देखते हुए पटपर दरवाजे के पास बसाया गया। दलित समाज रानी तालाब के आस-पास से धोबिया टंकी तक बसा,राजपूत लोग या तो किले के पास बसाए नहीं गए या फिर उन्होंने स्वयं बसना पसंद नहीं किया ।किले में भाव सिंह ने लवानो मंदिर के ऊपर गुंबद खड़ा किया और उदयपुर से दहेज में लाई गई मूर्तियों की स्थापना की ।
तुजुक – ए – जहांगीरी में भी “1618 में रीवा के राजा” का उल्लेख है।इससे स्पष्ट है कि 1618 के पूर्व रीवा बघेल राजाओं की एक व्यवस्थित राजधानी के रूप में स्थापित हो चुका था ।विक्रमादित्य जू देव के शासनकाल से भारत की आजादी के समय तक के अंतिम महाराजा मार्तंड सिंह जूदेव तक रीवा बघेल राजाओं की राजधानी बना रहा । यहां पर किलाआज भी व्यवस्थित और सुसज्जित रूप में मौजूद है,जहां राजघराने के वर्तमान वारिस निवास करते हैं । साथ ही बड़ी संख्या में लोग किले के म्यूजियम को देखने के साथ महामृत्युंजय का दर्शन करने के लिए दूर-दूर से आते हैं ।
वरुणेन्द्र प्रताप सिंह प्राचार्य की कलम से✍️

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